दुखड़ा रोना मुहावरे का अर्थ है dukhda rona muhavare ka arth – अपना दुख किसी को बताना या दुख जाहिर करना ।
दोस्तो वर्तमान में ऐसा समय है की संसार के हर मनुष्य को किसी न किसी प्रकार का दुख होता है । और कुछ लोगो का दुख इतना अधिक होता है की वे हमेशा ही दुखी रहते है । अपने इसी दुख के चलते वे लोग कभी भार इस दुख को दूसरे लोगो के साथ जाहिर कर देते है ।
यानि दुसरे लोगो को अपना दुख बता देते है । और इस तरह से जब कोई व्यक्ति किसी को अपना दुख बताता है या दुख जाहिर करता है तो इसे दुखडा रोना कहा जाता है ।

दुखड़ा रोना मुहावरे का वाक्य में प्रयोग
1.गांव में आग लग जाने के कारण से सभी लोग सरपंच साहब के घर के बाहर दुखडा रोने लगे ।
2.जब से कंचन की बेटी का देहांत हुआ है वह हर किसी के पास अपना दुखडा रोती है ।
3.इस तरह से दिन भर दुखडा रोने से वह वापस थोडे आ जाएगी ।
4.पति के मर जाने के कारण से रिया अपनी मां के पास दुखडा रोने लगी ।
5.जब राजा का पुत्र युद्ध में मारा गया तो राजा ने भरी सभा में दुखडा रो दिया ।
6.युद्ध में सहिद होने पर पूरे देश ने उसका दुखडा रोया ।
7.जब रामबाबू को पता चला की मुझे कैंसर है तो वह अपने मित्र के पास जाकर दुखडा रोने लगा ।
दुखड़ा रोना मुहावरे पर कहानी (साधु और दुखी चेला)
दोस्तो आज के बहुत समय पहले की बात है किसी नगर में नदी किनारे एक ज्ञानी साधू था जो की अपने आश्रम में अपने शिष्यो को ज्ञान देने का काम करता था । साधू अधिक ज्ञानी था जिसके कारण से दूर दूर से लोग अपने पुत्रो को उसी से ज्ञान दिलाने के लिए लाते थे । इसी तरह से लगभग 30 से 35 किलोमिटर से दूर एक अन्य गाव था जहां पर एक धनवान सेठ रहा करता था ।
सेठ के पास इतना अधिक धन था की वह अपने जीवन में घर बैठे पेट भर सकता था । इस सेठ का एक ही पुत्र था जो की बहुत ही नादन था और उसकी इसी नादानी को देख कर सेठ ने साधू के पास उसे ज्ञान देने के लिए भेजा । साथ ही सेठ ने साधू को अपना आश्रम चलाने के लिए कुछ धन दान भी दिया था । ताकी शिष्यो को अध्ययन करने में किसी प्रकार की समस्या का सामना न करना पड जाए ।
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इस तरह से फिर साधू के पास सेठ का बैटा जिसका नाम कुलचंद था अध्ययन करने लगा था । साधू अपने ज्ञान के आधार पर अपने सभी शिष्यो को समान ज्ञान देता और उन्हे दुख और सूख में एक दूसरे का साथी बनने को कहता था हालाकी आश्रम में किसी प्रकार का दूख तो नही था मगर साधू इसे सांसारीक जीवन से जोडता था ।
ताकी शिष्य जब भी आश्रम से ज्ञान हासिल कर कर जाए तो वह अपने जीवन को आराम से चला सके । इसी तरह से साधू और कुलचंद का जीवन चल रहा था और कुलचंद बडी ही आसानी से साधू से ज्ञान हासिल कर रहा था । उस समय एक नियम होता था की जब तक बच्चे की शिक्षा पूरी नही हो जाती है तब तक वह अपने माता पिता से मिलने के लिए नही जा सकता है ।
इसी कारण से साधू ने कुलचंद को अपने पास रखा और उसे ज्ञान दिया । कुलचंद को अपने माता पिता के बारे में कुछ पता नही था की उनका जीवन कैसा चल रहा था बल्की वह तो साधू के पास रह कर साधू से ज्ञान लेने में जूटा हुआ था और न ही कुलचंद के गुरू यानी साधू को इस बारे में पता था ।
20 वर्ष बित जाने पर कुलचंद की शिक्षा पूरी हो गई जिसके कारण से साधू ने कुलचंद को अपने घर जाने को कहा और कहा की अब तुम अपने जीवन में जो करना चाहते हो वह सोच समझ कर करना और कभी भी दुखो में दुखी न होना । इस तरह से कहते हुए साधू ने कुलचंद को अपने गाव भेज दिया ।
इस कारण से कुलचंद अपने गाव जाने लगा और जब कुलचंद का गाव पहुंचा तो उसे बहुत ही खुशी हो रही थी की वह अपने माता पिता से मिलेगा । इसी खुशी के साथ कुलचंद अपने पिता के घर महल में गया तो उसे पता चला की उसका पिता अब महल में नही रहता है बल्की वह एक झोपडपट्टी में रहता है । यह जान कर कुलचंद को बडा बूरा लगा क्योकी अच्छे खासे धनवान आदमी के साथ ऐसा कैसे हो गया ।
जब कुलचंद नेअपने माता पिता के बारे में कुछ लोगो से पूछा तो लोगो ने बताया की कुछ लूटेरो ने उनका सब कूछ लूट लिया और इसी कारण से वे इतने अधिक निर्धन हो गए की महल तक बेचना पड गया । यह जान कर कुलचंद और अधिक दूखी हो गया और अपने माता पिता से मिलने के लिए लोगो से उनका पता पूछा तो लोगो ने बताया की गाव में एक पुराना घर है जो की तुम्हारे पिता ने ले रखा है और अब वे वही पर रहते है ।
इसी के कारण से कुलचंद अपने माता पिता से मिलने के लिए उस घर में जाने लगा । जब कुलचंद उस घर के पास पहुंचा तो उसने देखा की घर तो एक उजडा भवन है और इसी तरह से फिर कुलचंद अंदर गया तो उसने देखा की घर पूरी तरह से गंदा हो चुका है और जब अपनी मां को आवाज लगाई तो उसकी मां दोडती हुई आई और अपने बेटे के गले में लग गई । मगर कुलचंद अपनी मां को देख कर जरा भी खुश नही था क्योकी उसकी मां की हालत बहुत ही बुरी हो चुकी थी वह दिखने में दूबली पतली हो गई थी उसे लग तक नही रहा था की यह मेरी ही मां है ।
तब कुलचंद ने अपने पिता के बारे में पूछा तो उसने बताया की तुम्हारे पिताजी बिमार चल रहे यह जान कर कुलचंद दूखी पर दूखी होता जा रहा था और अपने पिता की हालत को देख कर तो वह इतना अधिक दूखी हो गया की वह रोने लगा था । क्योकी कूलचंद को पता चला की सही तरह से भोजन न मिलने के कारण से उन्हे कैंसर की बिमारी हो गई है ।

अपने माता पिता के दुखो को देखकर कुलचंद को रात भर निंद नही आई जिसके कारण से अगले ही दिन उसने गाव में कोई काम खोजा और काम करने लगा था । क्योकी उसके गुरू ने उसे सिखाया था की कोई भी काम छोटा नही होता है और दुख में ऐसे छोटे मोटे काम करने ही पडते है । इसी कारण से कुलचंद चाय बेचने वाले के पास काम लगा था ।
जिसके कारण से कुलचंद का केवल घर ही चल पाता था । हालाकी वह मेहनती था जिसके कारण से वह बहुत मन लगा कर काम करता था । यह देखकर दुकान के मालिक ने उसे एक दूकान खोलकर दे दी और वह भी शहर में जिसके कारण कुलचंद को काफी अधिक लाभ हुआ क्योकी उसकी पगार बढ गई थी । मगर अब भी कुलचंद के पैस अपने माता पिता पर ही लग जाते थे ।
जिसके कारण से वह दो वर्षो तक आगे नही बढ पाया था बल्की इसी तरह से काम करने में लगा रहा । एक बार कुलचंद के गुरू यानि साधू शहर गया हुआ था तो उसने कुलचंद को चाय बेचते देख तो वह उसके पास चला गया और उससे कहने लगा की शिष्य मैंने जो ज्ञान दिया है उसके बदले में तुम्हे केवल चाय का काम मिला है । यह सुन कर कुलचंद ने कुछ नही कहा बल्की बात को टालने लगा ।
फिर साधू ने पूछा की तुम्हारे माता पिता कैसे है । यह सुन कर कुलचंद की आखो में आसू आ गए और साधू समझ गया की जरूर कुछ गलत है जिसके कारण से साधू ने कुलचंद से पूछा क्या हुआ अपने गुरू के पूछने पर कुलचंद ने अपने माता पिता का दूखडा रो दिया ।
जिससे साधू को भी दूख हुआ मगर साधू ने कहा की जीवन में ऐसे कष्ट आते रहते है मगर हमे कभी हार नही माननी चाहिए बल्की कठीन परिश्रम करते हुए उन दूखो को कम करना चाहिए । तब साधू ने उसे शहर में एक अच्छा काम दिलाया और उसे वही रहने को कहा ।
जिसके कारण से कुलचंद को अच्छी पगार मिल जाती थी और एक महिने में ही कुलचंद ने अपने घर को अच्छी तरह से बना लिया और अपने माता पिता की भी अच्छी तरह से देखभाल की । मगर कुलचंद ने अपने माता पिता के दुखो के बारे में किसी को नही बताया था यहां तक की उसके माता पिता ने भी अपना दुखडा नही रोया था ।
मगर इसी बिच कुलचंद के पिता का देहांत हो गया जिसके कारण से कुलचंद काफी अधिक दूखी था । और अब कुलचंद की आंखो में आसु आ जाते थे और वह हर किसी के सामने दुखडा रोने लग जाता था जिसके कारण से कुछ दिनो तक कुलचंद का काम भी ठप पड गया था ।
मगर फिर कुलचंद समभला और अपना काम मन लगा कर करने लगा और 2 वर्षो के बाद में कुलचंद ने अपनी हवेली वापस खरीद ली और अपनी मां को वहां पर रहने को कहा और उसकी अच्छी तरह से सेवा की । जिसके कारण से दोनो अधिक खुशी से जीवन जी रहे थे ।
इस तरह से कई दिनो के बाद में कुलचंद की महेन के कारण से उसे किसी के सामने दुखडा रोना नही पड रहा था बल्की खुशी के दिन आ गए थे । इस तरह से कुलचंद का जीवन सही तरह से चलने लगा था ।
इस तरह से आप इस कहानी से मुहावरे का अर्थ समझे होगे ।

दुखडा रोना मुहावरे पर निबंध
साथियो जीवन में दुख का होना एक आम बात होती है क्योकी ऐसा कोई भी व्यक्ति नही है जिसके जीवन में दुख का साया न हो मगर कुछ लोग अपने दुखो को दूसरो को बताते नही है बल्की कठोर हृदय करते हुए दुखो को छीपाने का प्रयास करते है ताकी उनके दुखो के बारे में किसी को पता न चले । इसके दो कारण होते है एक तो यह की जब दुसरो को दुख बताया जाता है तो वे दुखो को सुन कर ज्यादा खुश होते है क्योकी वे व्यक्ति उससे जलते है और उसे दुखी ही देखना पंसद करते है ।
दुसरा यह होता है की अपने दुखो के कारण से अन्य लोगो को दूखी नही किया जाता है ।
हालकी कहा जाता है की दुख को बाटने से कम होता है जिसके कारण से बहुत से लोग यह सलाह देते है की जो भी मन में दुख है वह लोगो के साथ बाट देना चाहिए । और इसी तरह से कुछ मुहावरा कहता है यानि जो दुख है उन्हे दूसरो को कहना या बताया जाता है तो इसे दूखडा रोना कहा जाता है क्योकी दुख को बताने पर आंखो में आसु आ ही जाते है जिसे रोना कहा जाता है ।
इस तरह से दूखो को रोना हो जाता है और उपर कहानी में भी यही बताया गया है की अपने माता पिता को देख कर कुलचंद दूखी हो जाता है और पिता के मरने पर वह और अधिक दूखी हो जाता है । भला क्यो न हो अपने माता पिता के दुखो को जान कर एक बेटा दूखी न होगा तो कोन होगा और पिता की मृत्यु पर तो बेटा या बेटी दुखी होगे ही।
मगर जब इस दूख के बारे में अन्य लोगो को बताया जाता है तो इसे इस मुहावरे के रूप में कहा जाता है की उसने दूखडा रो दिया ।
इस तरह से आप इस मुहावरे के अर्थ के बारे में जान गए होगे अगर आपको किसी प्रकार का प्रशन पूछना है तो कमेंट जरूर करे ।
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